अव्ययीभाव समास वह समास है जिसका पहला पद (पूर्वपद) अव्यय हो और वही प्रधान हो — और जिसके प्रभाव से पूरा समस्त पद भी अव्यय बन जाता है। जैसे — प्रतिदिन = प्रत्येक दिन। “अव्यय बन जाना” का मतलब है कि यह शब्द लिंग, वचन या कारक से कभी नहीं बदलता — प्रतिदिन हमेशा प्रतिदिन ही रहेगा, “प्रतिदिनों” कभी नहीं बनेगा।
यही न बदलने वाला गुण इस समास की सबसे पक्की पहचान है, और यही वह जाँच है जिससे अव्ययीभाव को तत्पुरुष समास से अलग किया जाता है — दोनों में विग्रह करते समय “के/का/तक” जैसे शब्द लगते हैं, इसलिए भ्रम सबसे ज़्यादा इन्हीं दो में होता है। नीचे पहले अव्यय के अनुसार बँटे 63 उदाहरण हैं, फिर परिभाषा, वह जाँच, और आम गलतियाँ।
अव्ययीभाव समास के 60+ उदाहरण
उदाहरण याद करने का सबसे आसान तरीक़ा शब्द-दर-शब्द रटना नहीं, बल्कि अव्यय के अनुसार पढ़ना है। एक बार “प्रति” या “यथा” का नियम पकड़ में आ गया, तो उस अव्यय से बने सारे शब्द अपने आप पहचान में आने लगते हैं।
1. “प्रति” से बने (12) — अर्थ: प्रत्येक / की ओर / के विरुद्ध
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| प्रतिदिन | प्रत्येक दिन |
| प्रतिवर्ष | प्रत्येक वर्ष |
| प्रतिमास | प्रत्येक मास |
| प्रतिसप्ताह | प्रत्येक सप्ताह |
| प्रतिक्षण | प्रत्येक क्षण |
| प्रतिपल | प्रत्येक पल |
| प्रत्येक | एक-एक |
| प्रत्यंग | अंग-अंग |
| प्रतिकूल | कूल (तट) के विपरीत |
| प्रत्यक्ष | अक्ष (आँख) के सामने |
| प्रतिरूप | रूप के अनुसार |
| प्रतिफल | फल के बदले |
2. “यथा” से बने (11) — अर्थ: के अनुसार
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| यथाशक्ति | शक्ति के अनुसार |
| यथासंभव | जैसा संभव हो |
| यथाक्रम | क्रम के अनुसार |
| यथानियम | नियम के अनुसार |
| यथाविधि | विधि के अनुसार |
| यथासमय | समय के अनुसार |
| यथामति | मति के अनुसार |
| यथारुचि | रुचि के अनुसार |
| यथायोग्य | योग्यता के अनुसार |
| यथासाध्य | जितना साधा जा सके |
| यथाशीघ्र | जितना शीघ्र हो सके |
3. “आ” से बने (8) — अर्थ: तक / पर्यंत
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| आजीवन | जीवन पर्यंत |
| आजन्म | जन्म से लेकर |
| आमरण | मरण तक |
| आकंठ | कंठ तक |
| आजानु | जानु (घुटनों) तक |
| आपादमस्तक | पाद से मस्तक तक |
| आबालवृद्ध | बालक से वृद्ध तक |
| आसमुद्र | समुद्र पर्यंत |
4. हिंदी के अव्यय — भर, हर, ही (12)
अव्ययीभाव सिर्फ़ संस्कृत के शब्दों तक सीमित नहीं है। रोज़ बोली जाने वाली हिंदी में भी यह भरपूर मिलता है।
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| दिनभर | पूरे दिन |
| रातभर | पूरी रात |
| जीवनभर | पूरे जीवन |
| उम्रभर | पूरी उम्र |
| सालभर | पूरे साल |
| हररोज़ | प्रत्येक रोज़ |
| हरदिन | प्रत्येक दिन |
| हरघड़ी | प्रत्येक घड़ी |
| घर-घर | प्रत्येक घर |
| रातोंरात | रात ही रात में |
| हाथोंहाथ | हाथ ही हाथ में |
| बीचोंबीच | बीच ही बीच में |
5. अनु, उप, निर् से बने (10)
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| अनुरूप | रूप के अनुसार |
| अनुकूल | कूल (तट) के अनुसार |
| अनुदिन | प्रत्येक दिन |
| अनुक्रम | क्रम के अनुसार |
| अनुसार | सार के अनुरूप |
| उपकूल | कूल के समीप |
| उपनगर | नगर के समीप |
| निर्विवाद | बिना विवाद के |
| निर्भय | बिना भय के |
| निर्विघ्न | बिना विघ्न के |
6. फ़ारसी-अरबी अव्यय — बे, ब, ला (10)
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| बेशक | बिना शक के |
| बेखटके | बिना खटके के |
| बेकाम | बिना काम के |
| बेधड़क | बिना धड़क के |
| बेरोक | बिना रोक के |
| बाकायदा | कायदे के साथ |
| बाइज़्ज़त | इज़्ज़त के साथ |
| बामुश्किल | मुश्किल के साथ |
| लापता | पते के बिना |
| लाजवाब | जवाब के बिना |
अव्ययीभाव समास की परिभाषा
जिस समास का पूर्वपद अव्यय हो और वही प्रधान हो, तथा जिसके कारण पूरा समस्त पद अव्यय की तरह व्यवहार करने लगे, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं। नाम भी यही बताता है — अव्ययी + भाव = अव्यय हो जाने का भाव।
अव्यय क्या होता है? वह शब्द जिसका रूप लिंग, वचन, कारक या काल — किसी से भी नहीं बदलता। जैसे यहाँ, कब, धीरे, और। अव्ययीभाव समास की खूबी यह है कि इसमें दूसरा पद संज्ञा होते हुए भी, पहले पद के अव्यय होने के कारण पूरा शब्द अव्यय बन जाता है। “दिन” संज्ञा है और उसका बहुवचन “दिनों” बनता है, पर “प्रतिदिन” बनते ही यह गुण खत्म हो जाता है — “प्रतिदिनों” कोई शब्द नहीं है।
अव्ययीभाव समास पहचानने की 3 ट्रिक
- बहुवचन बनाकर देखिए। यह सबसे पक्की जाँच है। अगर शब्द का बहुवचन बनता ही नहीं — प्रतिदिनों, यथाशक्तियों, आजीवनों — तो वह अव्ययीभाव है।
- पहला पद देखिए। प्रति, यथा, आ, अनु, उप, निर्, भर, हर, बे, ब, ला — इनमें से कोई पहले आ रहा है क्या? ये सब अव्यय हैं।
- वाक्य में इसका काम क्या है? अव्ययीभाव का समस्त पद प्रायः क्रिया की विशेषता बताता है — “वह प्रतिदिन आता है”, “उसने यथाशक्ति मदद की”। यानी यह वाक्य में क्रियाविशेषण की तरह काम करता है, संज्ञा की तरह नहीं।
अव्ययीभाव बनाम तत्पुरुष — असली फ़र्क
यहीं सबसे ज़्यादा गलती होती है, और इसकी वजह साफ़ है: दोनों समासों में विग्रह करते समय “का, के, से, तक” जैसे शब्द जोड़ने पड़ते हैं। यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार, और राजपुत्र = राजा का पुत्र — ऊपर से दोनों एक जैसे दिखते हैं। फ़र्क विग्रह में नहीं, शब्द के व्यवहार में है।
| पहचान का बिंदु | अव्ययीभाव | तत्पुरुष |
|---|---|---|
| कौन सा पद प्रधान | पूर्वपद (पहला) | उत्तरपद (दूसरा) |
| पहला पद कैसा होता है | अव्यय — प्रति, यथा, आ, बे | संज्ञा या सर्वनाम |
| समस्त पद का रूप | अव्यय — कभी नहीं बदलता | संज्ञा — लिंग/वचन से बदलता है |
| बहुवचन बनता है? | नहीं (प्रतिदिनों ✗) | हाँ (राजपुत्रों ✓) |
| वाक्य में भूमिका | क्रियाविशेषण | संज्ञा |
| उदाहरण | यथाशक्ति, प्रतिदिन, आजीवन | राजपुत्र, गंगाजल, देशभक्ति |
एक सेकंड की जाँच: शब्द का बहुवचन बनाकर बोलिए। “राजपुत्रों ने कहा” सही लगता है, इसलिए राजपुत्र तत्पुरुष है। “प्रतिदिनों ने” बोलते ही कान को गलत लगता है, इसलिए प्रतिदिन अव्ययीभाव है। यह जाँच किसी भी शब्द पर काम करती है और इसमें नियम याद रखने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
जहाँ सबसे ज़्यादा गलती होती है
| शब्द | ज़्यादातर लोग समझते हैं | असल में | क्यों |
|---|---|---|---|
| उपकूल | कर्मधारय — “उप” तो गौण बताता है | अव्ययीभाव | यहाँ “उप” का अर्थ समीप है — “कूल के समीप” |
| उपाध्यक्ष | अव्ययीभाव — “उप” से बना है | कर्मधारय | यहाँ “उप” का अर्थ गौण है — “गौण अध्यक्ष”। एक ही उपसर्ग, दो अलग समास |
| प्रत्यक्ष | तत्पुरुष | अव्ययीभाव | “प्रति” अव्यय है और प्रधान भी — “अक्ष के सामने” |
| यथाशक्ति | तत्पुरुष — “के अनुसार” लग रहा है | अव्ययीभाव | बहुवचन नहीं बनता और वाक्य में क्रियाविशेषण का काम करता है |
| दिनभर | द्वंद्व — दो शब्द जुड़े हैं | अव्ययीभाव | “दिन और भर” नहीं, “पूरे दिन” — “भर” यहाँ अव्यय है |
| निर्धन | अव्ययीभाव | बहुव्रीहि | यह किसी व्यक्ति की ओर इशारा करता है — “नहीं है धन जिसके पास” |
ऊपर की दूसरी और तीसरी पंक्ति ध्यान से पढ़िए — उपकूल और उपाध्यक्ष एक ही उपसर्ग से बने हैं, फिर भी अलग-अलग समास हैं। इससे यह साफ़ हो जाता है कि उपसर्ग देखकर समास तय करना गलत तरीक़ा है; देखना यह है कि उस उपसर्ग का अर्थ क्या है और शब्द वाक्य में कैसे बरतता है।
अभ्यास के लिए 12 प्रश्न
- “यथाशक्ति” का समास विग्रह क्या है?
उत्तर: शक्ति के अनुसार (अव्ययीभाव समास)। - अव्ययीभाव समास में कौन सा पद प्रधान होता है?
उत्तर: पूर्वपद, यानी पहला पद — जो अव्यय होता है। - अव्ययीभाव समास पहचानने की सबसे पक्की जाँच क्या है?
उत्तर: बहुवचन बनाकर देखना। अव्ययीभाव का बहुवचन नहीं बनता — “प्रतिदिनों” जैसा कोई शब्द नहीं होता। - “आजीवन” का विग्रह कीजिए।
उत्तर: जीवन पर्यंत — अव्ययीभाव समास। - “उपकूल” और “उपाध्यक्ष” में कौन सा समास है?
उत्तर: उपकूल अव्ययीभाव है (“कूल के समीप”), जबकि उपाध्यक्ष कर्मधारय है (“गौण अध्यक्ष”)। एक ही उपसर्ग होने से समास एक नहीं हो जाता। - निम्नलिखित में कौन अव्ययीभाव नहीं है — प्रतिदिन, यथाविधि, राजपुत्र, आमरण?
उत्तर: राजपुत्र — यह तत्पुरुष समास है। - “बेशक” में पहला पद क्या है?
उत्तर: “बे” — एक फ़ारसी अव्यय जिसका अर्थ “बिना” है। विग्रह: बिना शक के। - अव्ययीभाव समास वाक्य में क्या काम करता है?
उत्तर: क्रियाविशेषण का — यह क्रिया की विशेषता बताता है, जैसे “वह प्रतिदिन आता है”। - “आपादमस्तक” का विग्रह क्या है?
उत्तर: पाद से मस्तक तक — अव्ययीभाव समास। - “दिनभर” द्वंद्व समास क्यों नहीं है?
उत्तर: क्योंकि इसका विग्रह “दिन और भर” नहीं बनता। यहाँ “भर” एक अव्यय है और अर्थ है “पूरे दिन”, इसलिए यह अव्ययीभाव है। - “अव्ययीभाव” नाम का क्या अर्थ है?
उत्तर: अव्ययी + भाव, यानी अव्यय हो जाने का भाव — क्योंकि इस समास में पूरा समस्त पद अव्यय बन जाता है। - “प्रत्येक” में कौन सा समास है?
उत्तर: अव्ययीभाव समास — विग्रह “एक-एक”।
समास के बाकी पाँच भेद भी पढ़ें:
👉 तत्पुरुष समास के 10 उदाहरण
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
जिस समास का पहला पद अव्यय हो और वही प्रधान हो, तथा जिसके कारण पूरा समस्त पद अव्यय बन जाए, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं। जैसे — प्रतिदिन (प्रत्येक दिन)।
अव्ययीभाव में पूर्वपद प्रधान होता है और समस्त पद अव्यय बन जाता है, इसलिए उसका बहुवचन नहीं बनता। तत्पुरुष में उत्तरपद प्रधान होता है और समस्त पद संज्ञा रहता है, इसलिए उसका बहुवचन बनता है — प्रतिदिनों ✗, राजपुत्रों ✓।
प्रति, यथा, आ, अनु, उप, निर् — ये संस्कृत के अव्यय हैं; भर, हर, ही — हिंदी के; और बे, ब, ला — फ़ारसी-अरबी के। जैसे प्रतिदिन, यथाशक्ति, आजीवन, दिनभर, बेशक।
नहीं। उपकूल अव्ययीभाव है क्योंकि यहाँ उप का अर्थ समीप है, जबकि उपाध्यक्ष कर्मधारय है क्योंकि यहाँ उप का अर्थ गौण है। उपसर्ग नहीं, उसका अर्थ देखकर समास तय होता है।
आजीवन का विग्रह है — जीवन पर्यंत, यानी जीवन भर। यह अव्ययीभाव समास का उदाहरण है, जिसमें ‘आ’ अव्यय का अर्थ ‘तक’ है।
निष्कर्ष
अव्ययीभाव समास को नियम रटकर नहीं, एक जाँच से पकड़िए — शब्द का बहुवचन बनाकर बोलिए। अगर नहीं बनता, तो वह अव्ययीभाव है। यही एक कसौटी उसे तत्पुरुष से भी अलग कर देती है और द्वंद्व से भी, क्योंकि उन दोनों के समस्त पद संज्ञा रहते हैं और लिंग-वचन के साथ बदलते हैं। बाकी काम अव्ययों की सूची से हो जाता है — प्रति, यथा, आ, अनु, उप, भर, हर, बे, ब, ला — इन्हें पहचानते ही आधा उत्तर सामने आ जाता है।
