तत्पुरुष समास वह समास है जिसमें पूर्वपद (पहला शब्द) गौण होता है और उत्तरपद (दूसरा शब्द) प्रधान, तथा दोनों के बीच का कारक चिह्न — को, से, के लिए, का, में, पर — लुप्त हो जाता है। जैसे राजपुत्र = राजा का पुत्र।
नीचे दिए गए हैं तत्पुरुष समास के 10 उदाहरण, हर एक का विग्रह और भेद के साथ। इस एक टेबल में छहों भेद कवर हो जाते हैं, इसलिए परीक्षा में जो भी पूछा जाए, आपके पास तैयार जवाब रहेगा।
तत्पुरुष समास के 10 उदाहरण (विग्रह सहित)
| क्र. | समस्तपद (समास) | विग्रह | लुप्त चिह्न | भेद |
|---|---|---|---|---|
| 1 | गगनचुंबी | गगन को चूमने वाला | को | कर्म तत्पुरुष |
| 2 | माखनचोर | माखन को चुराने वाला | को | कर्म तत्पुरुष |
| 3 | हस्तलिखित | हाथ से लिखा हुआ | से | करण तत्पुरुष |
| 4 | मदांध | मद से अंधा | से | करण तत्पुरुष |
| 5 | रसोईघर | रसोई के लिए घर | के लिए | संप्रदान तत्पुरुष |
| 6 | देशभक्ति | देश के लिए भक्ति | के लिए | संप्रदान तत्पुरुष |
| 7 | पथभ्रष्ट | पथ से भ्रष्ट | से (अलग होना) | अपादान तत्पुरुष |
| 8 | ऋणमुक्त | ऋण से मुक्त | से (अलग होना) | अपादान तत्पुरुष |
| 9 | राजपुत्र | राजा का पुत्र | का | संबंध तत्पुरुष |
| 10 | जलमग्न | जल में मग्न | में | अधिकरण तत्पुरुष |
ध्यान दें: उदाहरण हमेशा समस्तपद होता है (जैसे “राजपुत्र”), उसका विग्रह नहीं (“राजा का पुत्र”)। परीक्षा में अक्सर यही उलटा लिख देने पर अंक कटते हैं।
तत्पुरुष समास किसे कहते हैं?
जिस समास में उत्तरपद प्रधान हो और दोनों पदों के बीच का कारक चिह्न (विभक्ति) लुप्त हो जाए, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं।
इसे तीन बातों से पहचानिए:
- दूसरा शब्द प्रधान होता है — “राजपुत्र” में मुख्य बात “पुत्र” है, “राजा” नहीं।
- बीच का कारक चिह्न गायब हो जाता है — “राजा का पुत्र” से “का” हट गया।
- विग्रह करने पर वही चिह्न वापस आ जाता है — यही चिह्न बताता है कि कौन-सा भेद है।
एक बात साफ़ कर लें — तत्पुरुष समास में कर्ता कारक (प्रथमा विभक्ति) का लोप नहीं होता। इसीलिए “कर्तृ तत्पुरुष” नाम का कोई भेद नहीं होता। तत्पुरुष के भेद द्वितीया से लेकर सप्तमी तक की छह विभक्तियों पर ही आधारित हैं।
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तत्पुरुष समास के 6 भेद
तत्पुरुष समास के भेद उसी कारक (विभक्ति) के नाम पर रखे जाते हैं, जिसका चिह्न लुप्त हुआ है। एक नज़र में:
| भेद | विभक्ति | लुप्त चिह्न | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| कर्म तत्पुरुष | द्वितीया | को | गगनचुंबी |
| करण तत्पुरुष | तृतीया | से, के द्वारा | हस्तलिखित |
| संप्रदान तत्पुरुष | चतुर्थी | के लिए | रसोईघर |
| अपादान तत्पुरुष | पंचमी | से (अलग होने के अर्थ में) | पथभ्रष्ट |
| संबंध तत्पुरुष | षष्ठी | का, के, की | राजपुत्र |
| अधिकरण तत्पुरुष | सप्तमी | में, पर | जलमग्न |
1. कर्म तत्पुरुष (द्वितीया) — चिह्न “को”
- गगनचुंबी = गगन को चूमने वाला
- माखनचोर = माखन को चुराने वाला
- जेबकतरा = जेब को कतरने वाला
- स्वर्गप्राप्त = स्वर्ग को प्राप्त
- ग्रामगत = ग्राम को गया हुआ
2. करण तत्पुरुष (तृतीया) — चिह्न “से”, “के द्वारा”
यहाँ “से” साधन या माध्यम के अर्थ में आता है — यानी किस चीज़ की मदद से काम हुआ।
- हस्तलिखित = हाथ से लिखा हुआ
- मदांध = मद से अंधा
- रेखांकित = रेखा से अंकित
- कष्टसाध्य = कष्ट से साध्य
- तुलसीकृत = तुलसी के द्वारा रचित
3. संप्रदान तत्पुरुष (चतुर्थी) — चिह्न “के लिए”
- रसोईघर = रसोई के लिए घर
- देशभक्ति = देश के लिए भक्ति
- विद्यालय = विद्या के लिए आलय
- हथकड़ी = हाथ के लिए कड़ी
- सत्याग्रह = सत्य के लिए आग्रह
4. अपादान तत्पुरुष (पंचमी) — चिह्न “से” (अलग होने के अर्थ में)
करण और अपादान — दोनों का चिह्न “से” है, इसलिए यहीं सबसे ज़्यादा गलती होती है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है: करण में “से” का मतलब साधन होता है, अपादान में अलगाव।
- पथभ्रष्ट = पथ से भ्रष्ट (रास्ते से हटा हुआ)
- ऋणमुक्त = ऋण से मुक्त
- जन्मांध = जन्म से अंधा
- भयभीत = भय से भीत
- देशनिकाला = देश से निकाला
5. संबंध तत्पुरुष (षष्ठी) — चिह्न “का”, “के”, “की”
यह सबसे आम भेद है। परीक्षा में जब कोई उदाहरण समझ न आए, तो सबसे पहले “का/के/की” लगाकर देखिए।
- राजपुत्र = राजा का पुत्र
- गंगाजल = गंगा का जल
- गृहस्वामी = गृह का स्वामी
- घुड़दौड़ = घोड़ों की दौड़
- पूँजीपति = पूँजी का पति (स्वामी)
6. अधिकरण तत्पुरुष (सप्तमी) — चिह्न “में”, “पर”
- जलमग्न = जल में मग्न
- शरणागत = शरण में आगत
- गृहप्रवेश = गृह में प्रवेश
- नीतिनिपुण = नीति में निपुण
- आपबीती = आप पर बीती
नञ् तत्पुरुष समास — एक खास भेद
ऊपर के छह भेदों के अलावा एक और भेद परीक्षा में बार-बार पूछा जाता है — नञ् तत्पुरुष। इसमें पूर्वपद निषेध बताने वाला उपसर्ग होता है, जैसे अ, अन्, न, ना।
- अनपढ़ = न पढ़ा हुआ
- असंभव = न संभव
- अन्याय = न न्याय
- अधर्म = न धर्म
- नास्तिक = न आस्तिक
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तत्पुरुष और कर्मधारय समास में अंतर
यह वह जगह है जहाँ ज़्यादातर छात्र फँसते हैं। दोनों में उत्तरपद प्रधान होता है, फिर भी दोनों अलग हैं:
| आधार | तत्पुरुष समास | कर्मधारय समास |
|---|---|---|
| दोनों पदों का संबंध | कारक का संबंध (को, से, के लिए, का, में) | विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय का संबंध |
| विग्रह में क्या आता है | कारक चिह्न — “राजा का पुत्र” | “जो … है” या “रूपी” — “नीला है जो कमल” |
| उदाहरण | राजपुत्र, जलमग्न, देशभक्ति | नीलकमल, महापुरुष, चरणकमल |
| पहचान | बीच में विभक्ति लगती है | बीच में विभक्ति नहीं, दोनों पद एक ही वस्तु के लिए |
सीधा तरीका — विग्रह करते समय अगर बीच में का/के/की/को/से/में/पर लगाना पड़े तो तत्पुरुष है। अगर “जो … है” लगाना पड़े तो कर्मधारय है।
तत्पुरुष समास पहचानने की 3-स्टेप ट्रिक
- शब्द को तोड़िए — “जलमग्न” को “जल” और “मग्न” में बाँटिए।
- बीच में चिह्न लगाकर देखिए — को, से, के लिए, का, में, पर — इनमें से कौन-सा फ़िट बैठता है? यहाँ “में” बैठा: जल में मग्न।
- चिह्न से भेद पहचानिए — “में” आया, यानी अधिकरण तत्पुरुष। बस हो गया।
अगर कोई भी चिह्न फ़िट न बैठे और दूसरा पद पहले पद की विशेषता बता रहा हो, तो वह तत्पुरुष नहीं — कर्मधारय है।
अभ्यास के लिए 5 प्रश्न
नीचे दिए शब्दों का विग्रह करके भेद बताइए। जवाब उसके नीचे दिए गए हैं।
- चिड़ीमार
- राजगृह
- यज्ञशाला
- धर्मविमुख
- आत्मविश्वास
| शब्द | विग्रह | भेद |
|---|---|---|
| चिड़ीमार | चिड़ी को मारने वाला | कर्म तत्पुरुष |
| राजगृह | राजा का गृह | संबंध तत्पुरुष |
| यज्ञशाला | यज्ञ के लिए शाला | संप्रदान तत्पुरुष |
| धर्मविमुख | धर्म से विमुख | अपादान तत्पुरुष |
| आत्मविश्वास | आत्मा पर विश्वास | अधिकरण तत्पुरुष |
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
तत्पुरुष समास वह समास है जिसमें उत्तरपद (दूसरा शब्द) प्रधान होता है और दोनों पदों के बीच का कारक चिह्न — को, से, के लिए, का, में, पर — लुप्त हो जाता है। जैसे राजपुत्र = राजा का पुत्र, जलमग्न = जल में मग्न।
तत्पुरुष समास के मुख्य रूप से 6 भेद होते हैं — कर्म (द्वितीया), करण (तृतीया), संप्रदान (चतुर्थी), अपादान (पंचमी), संबंध (षष्ठी) और अधिकरण (सप्तमी) तत्पुरुष। इनके अलावा नञ् तत्पुरुष भी एक महत्वपूर्ण भेद है। कर्ता कारक का लोप नहीं होता, इसलिए कर्तृ तत्पुरुष नाम का कोई भेद नहीं होता।
तत्पुरुष समास में उत्तरपद यानी दूसरा पद प्रधान होता है और पूर्वपद गौण। जैसे राजपुत्र में मुख्य बात पुत्र है, राजा नहीं।
दोनों का चिह्न से है, पर अर्थ अलग है। करण तत्पुरुष में से का मतलब साधन होता है, जैसे हस्तलिखित = हाथ से लिखा हुआ। अपादान तत्पुरुष में से का मतलब अलग होना होता है, जैसे पथभ्रष्ट = पथ से भ्रष्ट।
तत्पुरुष में दोनों पदों के बीच कारक का संबंध होता है और विग्रह में का, को, से, में जैसा चिह्न लगता है। कर्मधारय में विशेषण-विशेष्य का संबंध होता है और विग्रह में जो … है लगता है। जैसे राजपुत्र तत्पुरुष है, पर नीलकमल कर्मधारय।
जिस तत्पुरुष समास में पूर्वपद निषेध बताने वाला उपसर्ग हो — अ, अन्, न, ना — उसे नञ् तत्पुरुष कहते हैं। जैसे अनपढ़ = न पढ़ा हुआ, असंभव = न संभव, अन्याय = न न्याय।
निष्कर्ष
तत्पुरुष समास का पूरा खेल एक ही बात पर टिका है — बीच में कौन-सा कारक चिह्न लुप्त हुआ है। वही चिह्न भेद का नाम भी बता देता है। “को” मिला तो कर्म, “से” (साधन) मिला तो करण, “से” (अलगाव) मिला तो अपादान, “के लिए” मिला तो संप्रदान, “का/के/की” मिला तो संबंध, और “में/पर” मिला तो अधिकरण।
ऊपर दिए 10 उदाहरणों की टेबल को एक बार याद कर लीजिए — उसमें छहों भेद आ जाते हैं। इसके बाद कोई भी नया शब्द सामने आए, 3-स्टेप ट्रिक लगाकर आप खुद उसका भेद निकाल सकते हैं।
