बहुव्रीहि समास वह समास है जिसमें कोई भी पद प्रधान नहीं होता — दोनों पद मिलकर किसी तीसरी इकाई (व्यक्ति या वस्तु) की ओर इशारा करते हैं। जैसे — नीलकंठ = नीला है कंठ जिसका, अर्थात् शिव। यहाँ न “नीला” मुख्य है, न “कंठ” — मुख्य वह तीसरा है जिसका नाम शब्द में आया ही नहीं।
यही बात बहुव्रीहि को समास का सबसे उलझाने वाला भेद बनाती है, क्योंकि चतुर्भुज, त्रिनेत्र और पीतांबर जैसे शब्द हूबहू एक ही रूप में द्विगु या कर्मधारय भी हो सकते हैं। नीचे पहले 70+ उदाहरण श्रेणी के अनुसार दिए गए हैं, फिर परिभाषा, पहचान की ट्रिक, और वह तालिका जो एक ही शब्द को तीनों समासों में करके दिखाती है — असली फ़ैसला वहीं होता है।
बहुव्रीहि समास के 70+ उदाहरण
1. देवी-देवताओं के नाम (20)
बहुव्रीहि के सबसे ज़्यादा उदाहरण यहीं मिलते हैं, क्योंकि देवताओं के अधिकांश नाम उनके किसी लक्षण से बने हैं — नाम खुद शब्द में नहीं आता।
| समस्त पद | विग्रह | किसका नाम |
|---|---|---|
| नीलकंठ | नीला है कंठ जिसका | शिव |
| त्रिनेत्र | तीन नेत्र हैं जिसके | शिव |
| चंद्रशेखर | चंद्र है शेखर (मस्तक) पर जिसके | शिव |
| गंगाधर | गंगा को धारण किया है जिसने | शिव |
| पिनाकपाणि | पिनाक है पाणि (हाथ) में जिसके | शिव |
| मृत्युंजय | मृत्यु को जीत लिया है जिसने | शिव |
| पंचानन | पाँच आनन (मुख) हैं जिसके | शिव |
| चक्रपाणि | चक्र है पाणि में जिसके | विष्णु |
| चतुर्भुज | चार भुजाएँ हैं जिसकी | विष्णु |
| पद्मनाभ | पद्म है नाभि में जिसके | विष्णु |
| कमलनयन | कमल के समान नयन हैं जिसके | विष्णु / राम |
| पीतांबर | पीत (पीला) है अंबर (वस्त्र) जिसका | कृष्ण |
| मुरलीधर | मुरली धारण करता है जो | कृष्ण |
| गिरिधर | गिरि (पर्वत) धारण किया जिसने | कृष्ण |
| घनश्याम | घन (बादल) के समान श्याम है जो | कृष्ण |
| लंबोदर | लंबा है उदर जिसका | गणेश |
| गजानन | गज का आनन है जिसका | गणेश |
| एकदंत | एक दंत है जिसका | गणेश |
| वक्रतुंड | वक्र है तुंड जिसका | गणेश |
| वीणापाणि | वीणा है पाणि में जिसके | सरस्वती |
2. पौराणिक पात्र और देवताओं की उपाधियाँ (22)
| समस्त पद | विग्रह | किसका नाम |
|---|---|---|
| दशानन | दस आनन हैं जिसके | रावण |
| लंकेश | लंका का ईश है जो | रावण |
| दशरथ | दस रथ हैं जिसके | राजा दशरथ |
| षडानन | छह आनन हैं जिसके | कार्तिकेय |
| सहस्रबाहु | हज़ार भुजाएँ हैं जिसकी | कार्तवीर्य अर्जुन |
| नीलांबर | नीला अंबर है जिसका | बलराम |
| हलधर | हल धारण करता है जो | बलराम |
| महावीर | महान वीर है जो | हनुमान |
| वज्रकाय | वज्र के समान काया है जिसकी | हनुमान |
| त्रिलोचन | तीन लोचन हैं जिसके | शिव |
| दिगंबर | दिशाएँ ही अंबर हैं जिसका | शिव / जैन साधु |
| श्वेतांबर | श्वेत अंबर है जिसका | जैन साधु का एक संप्रदाय |
| चतुरानन | चार आनन हैं जिसके | ब्रह्मा |
| कमलासन | कमल है आसन जिसका | ब्रह्मा |
| शूलपाणि | शूल है पाणि में जिसके | शिव |
| चंद्रमौलि | चंद्र है मौलि (मस्तक) पर जिसके | शिव |
| त्रिपुरारि | त्रिपुर का अरि (शत्रु) है जो | शिव |
| हृषीकेश | हृषीक (इंद्रियों) का ईश है जो | विष्णु |
| गरुड़ध्वज | गरुड़ है ध्वज पर जिसके | विष्णु |
| मुरारि | मुर का अरि है जो | कृष्ण |
| मकरध्वज | मकर है ध्वज में जिसके | कामदेव |
| सुग्रीव | सुंदर है ग्रीवा जिसकी | वानरराज सुग्रीव |
3. व्यक्ति के रूप, गुण और स्वभाव से बने (16)
| समस्त पद | विग्रह | अर्थ |
|---|---|---|
| मंदबुद्धि | मंद है बुद्धि जिसकी | कम समझ वाला व्यक्ति |
| कुशाग्रबुद्धि | कुश के अग्र के समान तीक्ष्ण बुद्धि है जिसकी | तेज़ दिमाग़ वाला |
| जितेंद्रिय | जीत ली हैं इंद्रियाँ जिसने | संयमी व्यक्ति |
| महात्मा | महान है आत्मा जिसकी | संत |
| दुरात्मा | बुरी है आत्मा जिसकी | दुष्ट व्यक्ति |
| सुलोचना | सुंदर लोचन हैं जिसके | सुंदर नेत्रों वाली |
| मृगनयनी | मृग के समान नयन हैं जिसके | सुंदर स्त्री |
| चंद्रवदन | चंद्र के समान वदन है जिसका | सुंदर मुख वाला |
| दीर्घबाहु | लंबी भुजाएँ हैं जिसकी | लंबी बाँहों वाला |
| कृशोदर | कृश (पतला) है उदर जिसका | दुबला व्यक्ति |
| शतायु | सौ वर्ष है आयु जिसकी | दीर्घजीवी |
| अनाथ | नहीं है नाथ जिसका | जिसका कोई सहारा न हो |
| निर्धन | नहीं है धन जिसके पास | गरीब |
| निर्जन | नहीं हैं जन जहाँ | सुनसान स्थान |
| लालमुख | लाल है मुख जिसका | बंदर |
| निशाचर | निशा में विचरण करता है जो | राक्षस / उल्लू |
4. रोज़मर्रा की हिंदी में (12)
बहुव्रीहि सिर्फ़ पुराणों की चीज़ नहीं है — रोज़ बोले जाने वाले कई आम शब्द भी इसी समास से बने हैं।
| समस्त पद | विग्रह | अर्थ |
|---|---|---|
| चारपाई | चार पाए हैं जिसके | खाट |
| तिपाई | तीन पाए हैं जिसके | तिपहिया मेज़ |
| चौपाया | चार पैर हैं जिसके | पशु |
| दुपट्टा | दो पट (भाग) हैं जिसमें | ओढ़नी |
| तिरंगा | तीन रंग हैं जिसमें | भारत का राष्ट्रध्वज |
| पंकज | पंक (कीचड़) में जन्मा है जो | कमल |
| जलज | जल में जन्मा है जो | कमल |
| अंडज | अंडे से जन्म लेता है जो | पक्षी |
| चौमुखा | चार मुख हैं जिसके | एक प्रकार का दीपक |
| बारहसिंगा | बारह सींग हैं जिसके | एक हिरण |
| तिमंज़िला | तीन मंज़िलें हैं जिसमें | तीन मंज़िल का मकान |
| सिरफिरा | फिरा हुआ है सिर जिसका | सनकी व्यक्ति |
बहुव्रीहि समास की परिभाषा
जिस समास में कोई भी पद प्रधान न हो, बल्कि दोनों पद मिलकर किसी तीसरे अर्थ (किसी व्यक्ति, प्राणी या वस्तु) का बोध कराएँ, उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं। विग्रह करते समय अंत में प्रायः “जिसका”, “जिसके”, “जिसकी”, “जो” जैसे शब्द आते हैं।
नाम की कहानी भी यही नियम समझाती है। संस्कृत में बहुव्रीहि का शाब्दिक अर्थ है “बहुत व्रीहि (चावल) है जिसके पास” — यानी शब्द में चावल और बहुत, दोनों हैं, पर अर्थ निकलता है धनी व्यक्ति का, जिसका ज़िक्र शब्द में कहीं नहीं है। पूरे समास का नाम ही उसका सबसे अच्छा उदाहरण है।
बहुव्रीहि समास पहचानने की 3 ट्रिक
- “जिसका / जिसके / जो” लगाकर विग्रह कीजिए। अगर विग्रह इनके बिना पूरा न हो, तो बहुव्रीहि है — “नीला है कंठ जिसका“।
- पूछिए: यह शब्द किसका नाम बन गया है? बहुव्रीहि का समस्त पद हमेशा किसी बाहरी व्यक्ति या वस्तु का नाम होता है, जो शब्द के भीतर मौजूद ही नहीं। लंबोदर में “गणेश” शब्द कहीं नहीं है, फिर भी अर्थ गणेश है।
- समस्त पद विशेषण की तरह काम करता है क्या? बहुव्रीहि का पद प्रायः किसी की विशेषता बताता है — “वह मंदबुद्धि है”, “वह जितेंद्रिय है”। बाकी समासों के पद शुद्ध संज्ञा रहते हैं।
एक ही शब्द, तीन अलग समास — असली फ़ैसला यहाँ होता है
समास के प्रश्न में सबसे ज़्यादा नंबर यहीं कटते हैं। कई शब्द अक्षर-दर-अक्षर एक जैसे रहते हुए भी अलग-अलग समास बन जाते हैं — यह इस पर निर्भर करता है कि शब्द खुद अपना वर्णन कर रहा है या किसी तीसरे की ओर इशारा। नीचे वही शब्द तीनों रूपों में रखकर दिखाए गए हैं।
| शब्द | कर्मधारय / द्विगु के रूप में (खुद का वर्णन) | बहुव्रीहि के रूप में (तीसरे की ओर इशारा) |
|---|---|---|
| चतुर्भुज | चार भुजाओं का समूह — एक ज्यामितीय आकृति (द्विगु) | जिसकी चार भुजाएँ हैं — विष्णु |
| त्रिनेत्र | तीन नेत्रों का समूह (द्विगु) | जिसके तीन नेत्र हैं — शिव |
| नीलकंठ | नीला कंठ — एक नीले रंग का गला (कर्मधारय) | नीला है कंठ जिसका — शिव / एक पक्षी |
| पीतांबर | पीला अंबर — एक पीला वस्त्र (कर्मधारय) | पीत है अंबर जिसका — कृष्ण |
| दशानन | दस आननों का समूह (द्विगु) | दस आनन हैं जिसके — रावण |
| महात्मा | महान आत्मा (कर्मधारय) | महान है आत्मा जिसकी — संत, महापुरुष |
| तिरंगा | तीन रंगों का समूह (द्विगु) | तीन रंग हैं जिसमें — राष्ट्रध्वज |
एक वाक्य का नियम: अगर समस्त पद किसी नाम की तरह इस्तेमाल हो रहा है — शिव, विष्णु, रावण, राष्ट्रध्वज — तो वह बहुव्रीहि है। अगर वह किसी आकृति, वस्तु या समय-अवधि का सीधा वर्णन कर रहा है, तो द्विगु या कर्मधारय समास है — पहला पद संख्या हो तो द्विगु, गुण बताने वाला विशेषण हो तो कर्मधारय।
बहुव्रीहि बनाम बाकी समास — एक तालिका में
| पहचान का बिंदु | बहुव्रीहि | कर्मधारय | द्विगु | तत्पुरुष |
|---|---|---|---|---|
| कौन सा पद प्रधान | कोई नहीं — तीसरा अर्थ प्रधान | उत्तरपद | उत्तरपद | उत्तरपद |
| विग्रह में क्या आता है | जिसका / जिसके / जो | जो / रूपी | समूह / समाहार | का, को, से, के लिए |
| अर्थ कहाँ है | शब्द के बाहर | शब्द के भीतर | शब्द के भीतर | शब्द के भीतर |
| उदाहरण | लंबोदर = गणेश | नीलकमल | त्रिभुज | राजपुत्र |
जहाँ सबसे ज़्यादा गलती होती है
| शब्द | ज़्यादातर लोग समझते हैं | असल में | क्यों |
|---|---|---|---|
| नीलकमल | बहुव्रीहि | कर्मधारय | यह सचमुच का नीला कमल है — किसी तीसरे का नाम नहीं |
| लंबोदर | कर्मधारय — लंबा उदर | बहुव्रीहि | अर्थ “लंबा पेट” नहीं, “गणेश” है |
| तिरंगा | हमेशा द्विगु | संदर्भ पर निर्भर | “तीन रंगों का समूह” = द्विगु; “राष्ट्रध्वज” के अर्थ में = बहुव्रीहि |
| पंकज | तत्पुरुष — पंक में जन्मा | बहुव्रीहि | यह किसी तीसरी वस्तु (कमल) का नाम बन चुका है |
| दशरथ | द्विगु — दस रथों का समूह | बहुव्रीहि | यह एक राजा का नाम है, रथों की गिनती नहीं |
| महात्मा | हमेशा कर्मधारय | संदर्भ पर निर्भर | “महान आत्मा” = कर्मधारय; “जिसकी आत्मा महान है, वह व्यक्ति” = बहुव्रीहि |
अभ्यास के लिए 12 प्रश्न
- “नीलकंठ” का समास विग्रह कीजिए।
उत्तर: नीला है कंठ जिसका — अर्थात् शिव (बहुव्रीहि समास)। - बहुव्रीहि समास में कौन सा पद प्रधान होता है?
उत्तर: कोई भी पद प्रधान नहीं होता — प्रधान वह तीसरा अर्थ है जो शब्द के बाहर है। - “चतुर्भुज” कब बहुव्रीहि बनता है?
उत्तर: जब यह विष्णु की ओर इशारा करे (“जिसकी चार भुजाएँ हैं”)। आकृति के अर्थ में यह द्विगु समास है। - “दशानन” किसका नाम है और यह कौन सा समास है?
उत्तर: रावण — बहुव्रीहि समास (दस आनन हैं जिसके)। - बहुव्रीहि समास के विग्रह में प्रायः कौन से शब्द आते हैं?
उत्तर: जिसका, जिसके, जिसकी, जो। - निम्नलिखित में कौन बहुव्रीहि नहीं है — लंबोदर, गजानन, नीलकमल, वीणापाणि?
उत्तर: नीलकमल — यह कर्मधारय समास है, क्योंकि यह सचमुच का नीला कमल है। - “पंकज” में कौन सा समास है?
उत्तर: बहुव्रीहि — “पंक में जन्मा है जो”, अर्थात् कमल। - “बहुव्रीहि” शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर: “बहुत व्रीहि (चावल) है जिसके पास” — अर्थात् धनी व्यक्ति। नाम खुद इसी समास का उदाहरण है। - “चारपाई” कौन सा समास है?
उत्तर: बहुव्रीहि — “चार पाए हैं जिसके”, अर्थात् खाट। - बहुव्रीहि और कर्मधारय में एक वाक्य में अंतर बताइए।
उत्तर: कर्मधारय का अर्थ शब्द के भीतर ही मिल जाता है, बहुव्रीहि का अर्थ शब्द के बाहर किसी तीसरी इकाई में होता है। - “जितेंद्रिय” का विग्रह क्या है?
उत्तर: जीत ली हैं इंद्रियाँ जिसने — बहुव्रीहि समास। - “तिरंगा” द्विगु है या बहुव्रीहि?
उत्तर: दोनों हो सकता है। “तीन रंगों का समूह” के अर्थ में द्विगु, और “भारत का राष्ट्रध्वज” के अर्थ में बहुव्रीहि।
समास के बाकी पाँच भेद भी पढ़ें:
👉 तत्पुरुष समास के 10 उदाहरण
👉 कर्मधारय समास के उदाहरण
👉 द्विगु समास के 30+ उदाहरण
👉 द्वंद्व समास के 70+ उदाहरण
👉 अव्ययीभाव समास के 60+ उदाहरण
👉 हिंदी व्याकरण की पूरी गाइड
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
जिस समास में कोई भी पद प्रधान न हो और दोनों पद मिलकर किसी तीसरी इकाई का बोध कराएँ, उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं। जैसे — नीलकंठ (नीला है कंठ जिसका, अर्थात् शिव)।
कर्मधारय का अर्थ शब्द के भीतर ही पूरा हो जाता है — नीलकमल यानी सचमुच का नीला कमल। बहुव्रीहि का अर्थ शब्द के बाहर होता है — नीलकंठ का अर्थ नीला गला नहीं, शिव है।
हाँ। चतुर्भुज, त्रिनेत्र, दशानन और तिरंगा जैसे शब्द संदर्भ के अनुसार बदल जाते हैं। जब शब्द खुद अपना वर्णन करे तो द्विगु, और जब वह किसी तीसरे (विष्णु, शिव, रावण, राष्ट्रध्वज) का नाम बन जाए तो बहुव्रीहि।
विग्रह के अंत में प्रायः जिसका, जिसके, जिसकी या जो आता है — जैसे लंबोदर = लंबा है उदर जिसका।
संस्कृत में इसका शाब्दिक अर्थ है ‘बहुत व्रीहि यानी चावल है जिसके पास’ — अर्थात् धनी व्यक्ति। शब्द में चावल की बात है, पर अर्थ निकलता है किसी व्यक्ति का, इसलिए नाम खुद इस समास का उदाहरण है।
निष्कर्ष
बहुव्रीहि समास की पूरी पहचान एक सवाल में सिमट जाती है — अर्थ शब्द के भीतर है या बाहर? अगर समस्त पद पढ़ने के बाद भी असली विषय शब्द में कहीं नहीं मिलता और वह किसी तीसरे का नाम बन जाता है, तो वह बहुव्रीहि है। यही कारण है कि देवताओं के अधिकांश नाम इसी समास से बने हैं, और यही कारण है कि चतुर्भुज या तिरंगा जैसे शब्दों का उत्तर परीक्षा में संदर्भ देखकर देना पड़ता है, रट्टा लगाकर नहीं।
